मुंबई के चेम्बूर में एक हाउसिंग सोसाइटी के दो सदस्यों—श्रीमती विश्वनाथ और श्री कल्पाठी—ने सोसाइटी के रीडेवलपमेंट प्लान को चुनौती दी। उनका मुख्य आरोप था कि चुने गए बिल्डर अन्य बिल्डर्स की तुलना में लगभग 10% कम क्षेत्रफल दे रहे हैं। इससे प्रत्येक सदस्य को 25 से 30 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि सोसाइटी के पास चार अन्य बिल्डर्स के ऑफर थे जो ज्यादा एरिया और बेहतर शर्तें दे रहे थे।
दोनों सदस्यों ने बिल्डर की वित्तीय क्षमता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय के रिकॉर्ड चेक करने का जिक्र किया और कहा कि चुने गए बिल्डर ने परमानेंट अल्टरनेट अकॉमोडेशन एग्रीमेंट (PAAA) पर सही तरीके से हस्ताक्षर नहीं किए, 20% बैंक गारंटी नहीं दी और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट (PMC) की नियुक्ति भी नहीं हुई। उनका तर्क था कि रीडेवलपमेंट को बहुमत या बिल्डर की मर्जी से थोपा नहीं जा सकता। सदस्यों की सुरक्षा, मुआवजा और कानूनी अधिकार सुनिश्चित होने चाहिए।
सोसाइटी ने जवाब दिया कि रीडेवलपमेंट प्लान 17 में से 15 सदस्यों के बहुमत से पास हुआ था। असहमति वाले सिर्फ दो सदस्य थे।
महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव अपीलेट कोर्ट का अंतरिम फैसला
4 सितंबर 2026 को महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव अपीलेट कोर्ट ने अंतरिम फैसले में इन दो सदस्यों की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
बैंक गारंटी अनिवार्य नहीं बल्कि सिर्फ सिफारिश है। बॉम्बे हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले (एंटरिक्ष रियल्टर्स बनाम विद्याविहार पामव्यू को-ऑप हाउसिंग सोसाइटी) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ बैंक गारंटी न होने से रीडेवलपमेंट प्रक्रिया अवैध नहीं हो जाती। सदस्य इस पर जोर नहीं दे सकते।
पीएमसी की नियुक्ति बाद में करने का फैसला भी एजीएम में बहुमत से लिया गया था।
दोनों असहमति वाले सदस्यों ने भी बाद में पीएएए पर हस्ताक्षर कर दिए थे और अपनी जगह का कब्जा बिल्डर को सौंप दिया था।
कोर्ट ने बैलेंस ऑफ कन्वीनिएंस इन सदस्यों के पक्ष में नहीं पाया। 17 में से ज्यादातर सदस्यों की सहमति और सामूहिक हित को प्राथमिकता दी गई।
एडवोकेट डॉ. दिव्या स्वामी (डीएंडवाई लॉ चैंबर्स) के अनुसार कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं से ज्यादा सामूहिक भलाई और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया। बहुमत की सहमति को असहमति पर भारी माना गया।
हाउसिंग सोसाइटी सदस्यों के लिए सबक
यह फैसला हाउसिंग सोसाइटी रीडेवलपमेंट के मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल है। महाराष्ट्र में कोर्ट अक्सर बहुमत के फैसले को प्राथमिकता देते हैं, खासकर जब ज्यादातर सदस्यों ने सहमति दे दी हो और प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी हो। असहमति वाले सदस्यों को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन वे पूरे प्रोजेक्ट को लंबे समय तक रोक नहीं सकते अगर कानूनी प्रक्रिया सही तरीके से अपनाई गई हो।
सोसाइटी सदस्यों को सलाह:
रीडेवलपमेंट से पहले सभी ऑफर ध्यान से तुलना करें।
बैंक गारंटी, पीएमसी और पीएएए जैसे सुरक्षा उपायों पर जोर दें, भले ही कुछ सिफारिश मात्र हों।
बहुमत का फैसला महत्वपूर्ण है, लेकिन दस्तावेज और पारदर्शिता सुनिश्चित करें।
असहमति होने पर उचित कानूनी मंच पर जाएं, लेकिन सामूहिक हित को भी ध्यान में रखें।
यह मामला अभी मुख्य ट्रायल कोर्ट में चल रहा है। असहमति वाले सदस्य अतिरिक्त सबूत पेश कर सकते हैं। हाउसिंग सोसाइटी रीडेवलपमेंट एक जटिल प्रक्रिया है। सही जानकारी और कानूनी सलाह से सदस्यों के अधिकार सुरक्षित रह सकते हैं।
(नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले योग्य वकील से सलाह लें।)

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