“बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में उपेक्षा करने वाले बेटे को फ्लैट से निकाला गया। जानें क्या विरासत का हक बचा है और हाउसिंग सोसाइटी सदस्यों के लिए क्या सबक है।”
कोर्ट ने उपेक्षा करने वाले बेटे को फ्लैट से बेदखल किया – क्या विरासत का अधिकार अभी भी है?
भारत में हाउसिंग सोसाइटियों और फ्लैट्स से जुड़े पारिवारिक विवाद आम होते जा रहे हैं। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को फिर से मजबूत किया है। कोर्ट ने एक बेटे को उसके माता-पिता के फ्लैट से बेदखल करने का आदेश दिया क्योंकि उसने उनकी देखभाल का वादा तोड़ा।
यह मामला सिर्फ बेदखली तक सीमित नहीं है। बहुत से लोग पूछते हैं – क्या ऐसे बेटे का माता-पिता की संपत्ति पर विरासत का अधिकार खत्म हो जाता है?
क्या हुआ था इस मामले में?
माता-पिता ने अपने लोअर परेल (मुंबई) स्थित फ्लैट को बेटे को गिफ्ट डीड के जरिए ट्रांसफर किया था। गिफ्ट डीड में साफ शर्त लिखी थी कि बेटा माता-पिता की हर तरह से देखभाल करेगा। शादी के बाद बेटा पत्नी के साथ उसी फ्लैट में रहने लगा, लेकिन देखभाल का वादा पूरा नहीं किया। माता-पिता को खुद अपना घर छोड़ना पड़ा।
वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल ने गिफ्ट डीड रद्द कर दी और बेटे को फ्लैट खाली करने का आदेश दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा।
कोर्ट ने Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 की धारा 23 का हवाला दिया। इस धारा के अनुसार, अगर वरिष्ठ नागरिक संपत्ति इस शर्त पर ट्रांसफर करते हैं कि उनकी देखभाल की जाएगी और प्राप्तकर्ता ऐसा नहीं करता, तो ट्रांसफर को धोखाधड़ी या जबरदस्ती माना जा सकता है और उसे रद्द किया जा सकता है।
क्या बेटे का विरासत का अधिकार खत्म हो गया?
नहीं, पूरी तरह नहीं। लेकिन स्थिति बदल गई है।
गिफ्ट डीड रद्द होने के बाद संपत्ति फिर से माता-पिता के नाम वापस आ गई। जैसे ट्रांसफर हुआ ही न हो।
यह फ्लैट माता-पिता की स्वअर्जित संपत्ति (self-acquired property) थी, जो उन्होंने 2005 में खरीदी थी। हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत, स्वअर्जित संपत्ति पर बेटे का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता जब माता-पिता जीवित हों।
बेटा इस फ्लैट का वारिस तभी बन सकता है जब:
माता-पिता बिना वसीयत (Will) के निधन हो जाएं, और वह क्लास-I वारिस के रूप में मां और बहनों के साथ हिस्सा पाए, या
माता-पिता अपनी वसीयत में उसे नामित करें।
अगर संपत्ति पैतृक (ancestral) होती, तो स्थिति अलग होती। पैतृक संपत्ति में बेटा (और 2005 के बाद बेटी भी) जन्म से अधिकार रखता है। लेकिन स्वअर्जित संपत्ति में माता-पिता पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
वरिष्ठ नागरिक माता-पिता क्या कर सकते हैं?
स्वअर्जित संपत्ति पर माता-पिता का नियंत्रण ज्यादा मजबूत है। वे:
वसीयत बनाकर किसी भी बच्चे को विरासत से बाहर रख सकते हैं।
संपत्ति को बिना शर्त किसी और को गिफ्ट या ट्रांसफर कर सकते हैं।
अगर गिफ्ट करना है तो देखभाल की शर्त जरूर लिखें – यही धारा 23 का सुरक्षा कवच है।
सभी दस्तावेज सही से रजिस्टर्ड और लिखित रखें। कोर्ट मौखिक दावों से ज्यादा लिखित सबूतों पर भरोसा करता है।
हाउसिंग सोसाइटी के सदस्यों के लिए सबक
फ्लैट और हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले परिवारों के लिए यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण है। कई बार बेटा-बहू फ्लैट पर कब्जा जमा लेते हैं और बुजुर्ग माता-पिता को परेशान करते हैं। अब कानून साफ है – देखभाल न करने पर बेदखली संभव है, खासकर जब गिफ्ट में शर्त हो।
सोसाइटी कमेटियों और सदस्यों को भी ध्यान रखना चाहिए कि वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो। संपत्ति विवादों में जल्दी कानूनी सलाह लेना बेहतर है।
निष्कर्ष
माता-पिता की उपेक्षा करने वाले बेटे को फ्लैट से निकाला जा सकता है, लेकिन विरासत का अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं होता – खासकर स्वअर्जित संपत्ति में। सही वसीयत और दस्तावेज ही असली सुरक्षा हैं।
अगर आपके हाउसिंग सोसाइटी में भी ऐसे पारिवारिक-संपत्ति विवाद हैं, तो कानूनी सलाह जरूर लें। वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हर किसी की जिम्मेदारी है।

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