किरायेदार को सोसाइटी रीडेवलपमेंट में 1.38 करोड़ के फ्लैट मिले, इनकम टैक्स ने लगाया नोटिस – जानें ITAT मुंबई ने कैसे दिया राहत
मुंबई के माटुंगा इलाके के एक किरायेदार श्री देवशिच्छदवा को अपनी सोसाइटी के रीडेवलपमेंट के दौरान किरायेदारी अधिकार छोड़ने के बदले दो फ्लैट मिले। इन फ्लैटों का स्टांप ड्यूटी वैल्यू 1.38 करोड़ रुपये था। लेकिन इनकम टैक्स विभाग ने सेक्शन 56(2)(x) के तहत नोटिस जारी कर पूरी रकम को “अन्य स्रोतों से आय” मानकर टैक्स लगाने की कोशिश की। लंबी लड़ाई के बाद ITAT मुंबई ने किरायेदार के पक्ष में फैसला सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
श्री देवशिच्छदवा माटुंगा की एक हाउसिंग सोसाइटी में चार दुकानों के किरायेदार थे। जब सोसाइटी रीडेवलपमेंट के लिए तैयार हुई तो बिल्डर के साथ परमानेंट अल्टरनेट एकोमोडेशन (PAA) एग्रीमेंट हुआ। इस एग्रीमेंट के तहत किरायेदार को अपनी किरायेदारी अधिकार सरेंडर करने थे और बदले में रीडेवलप्ड बिल्डिंग में दो फ्लैट मिलने थे।
इन फ्लैटों का स्टांप ड्यूटी मूल्य लगभग 1.38 करोड़ रुपये था। इनकम टैक्स असेसिंग ऑफिसर (पेरेल) ने सेक्शन 56(2)(x) लागू करते हुए पूरी राशि को किरायेदार की आय मान लिया। CIT(A) ने भी इस जोड़ को बरकरार रखा।
सेक्शन 56(2)(x) क्या कहता है?
यह सेक्शन तब लागू होता है जब कोई व्यक्ति बिना पर्याप्त प्रतिफल या मुफ्त में कोई संपत्ति (जैसे प्रॉपर्टी) प्राप्त करता है और उसकी वैल्यू 50,000 रुपये से ज्यादा हो। विभाग का तर्क था कि किरायेदार को फ्लैट “मुफ्त” मिले हैं।
ITAT मुंबई ने क्या कहा?
16 जुलाई 2026 को ITAT मुंबई की बेंच (विक्रम सिंह यादव और सिद्धार्थ नौटियाल) ने किरायेदार के पक्ष में फैसला दिया। मुख्य बातें:
वास्तविक प्राप्ति नहीं हुई: सेक्शन 56(2)(x) तभी लागू होता है जब संपत्ति वास्तव में “प्राप्त” हो। रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट अभी अधूरा था, ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट नहीं मिला था और कब्जा भी नहीं दिया गया था। सिर्फ एग्रीमेंट रजिस्टर होने से संपत्ति प्राप्त नहीं मानी जा सकती।
प्रतिफल मौजूद था: फ्लैट मुफ्त नहीं मिले थे। ये किरायेदारी अधिकार सरेंडर करने के बदले मिले थे। यह एक व्यावसायिक लेन-देन था, न कि मुफ्त उपहार।
पिछले फैसलों का सहारा: ट्रिब्यूनल ने स्नेहलता हेरंब धायगुड़े, अनिल दत्ताराम पिटाले और अमर नरेंद्र जोशी जैसे मामलों का हवाला दिया जहां इसी तरह की राहत दी गई थी।
नतीजतन, 1.38 करोड़ रुपये का जोड़ हटा दिया गया और अपील मंजूर कर ली गई।
महत्वपूर्ण बात
यह फैसला सिर्फ सेक्शन 56(2)(x) पर केंद्रित है। किरायेदारी अधिकार सरेंडर करने पर कैपिटल गेंस टैक्स लग सकता है या नहीं – यह अलग मुद्दा है। कई मामलों में किरायेदारी अधिकार को कैपिटल एसेट माना जाता है और सरेंडर को ट्रांसफर माना जाता है।
किरायेदारों के लिए सबक
रीडेवलपमेंट एग्रीमेंट में स्पष्ट शर्तें लिखवाएं।
कब्जा मिलने से पहले टैक्स नोटिस आने पर घबराएं नहीं।
विशेषज्ञ सीए या टैक्स सलाहकार की मदद लें।
RERA पोर्टल पर प्रोजेक्ट स्टेटस का रिकॉर्ड रखें।
रीडेवलपमेंट में किरायेदारों के अधिकार और टैक्स नियमों को समझना बहुत जरूरी है। सही जानकारी और दस्तावेज होने से आप अनावश्यक टैक्स बोझ से बच सकते हैं।
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स्रोत: Economic Times / ITAT Mumbai Order (जुलाई 2026)

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